Monthly Archives: July 2016

): हँसी (:


लोग पूछते हैं मुझसे,
“तुम इतना कैसे मुस्कुरा पाती हो ?
तुम झूठी हो जो
खोखली हँसी हमें दिखती हो!”

परवाह मेरी मुहसे भी
ज़्यादा करते हैं!
लोग मेरी हँसी से
काफ़ी डरते हैं !!

परवाह उन्हें ये नहीं,
कि वो खुश क्यों नहीं ।
फ़िक्र बड़ी इस बात की,
कि मैं मायूस क्यों नहीं ?!?

खुश जब मैं काफ़ी होती हूँ ,
उस दोपहर फ़िर काफ़ी रोती हूँ।

नज़र जो लगती है मेरी हँसी को,
ज़माने की ।
क्या करूँ ! मेरी फ़ितरत में नहीं
हँसी छिपाने की ।

हँसती रहूंगी मैं ,
चाहे कितनी भी खोखली क्यों न हो।
दो ऑंसू ही टपक जाएं,
ज़ख्म कितनी भी गहरी क्यों न हो।

रोते हुए जो आई थी,
हँसते चेहरे दिख गए थे।
हँसते हुए जो जाऊँगी,
दुनिया रोती रह जाएगी …

शायद। …. शायद ?

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