~नमक स्वाद अनुसार~


कभी मम्मी कह दे कि आज  ज़रा और  पढ़ लो, Exam नज़दीक आ रहे हैं।  तो लो ! पढाई वहीँ ठप  हो जाती; बड़ा ठेस पहुँचता स्वाभिमान को। अगले दिन सुबह के  तीन बजे, आँखें मलती हुई , गुनगुनाकर , नींद से लड़कर पढ़ती। Mummy  पानी पीने  के लिए  उठकर देखती और कहती, “इतनी भी क्या पढ़ाई ! पागल हो जाओगी !” फ़िर तो ! नींद गायब और चार घंटों  धुआँधार  पढ़ाई  शुरू !
 
उसे आदत  नहीं थी  कि कोशिश में उसकी कभी कोई कमी रह जाए। चाहे painting बनाने में हो, लोगों से मीठी बातें करने में या किताबों  में डूब कर अपने कल  का सपना देखने में। आस- पड़ोस  का आदर्श कहलाना, सबकी नज़रों में अपनी गरीमा  बनाये रखने  में… उसे खुद पर काफ़ी ग़ुरूर था।  अच्छाई की इतनी गंदी  आदत लगी थी उसको , की किसीसे न बुरा बोल पाती और न ही सेह पाती।  ख़ैर आदत भी अति ही थी। … 
 
वक़्त के पहिये पलटते गए,  किताबों  की भीड़ में टहलती -खोती , खोजती – ग़ुम होती। …अपने  राह कुछ चुने,  कुछ  बनाए ।  पर कोशिश हमेशा जारी रहती। 
 
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बावजूद इसके कोई खुश न था ! कभी बिंदी का आकार छोटा लगता , तो कभी हाथों में कँगन कम दिखते , कभी बहुत बातूनी लगती , तो कभी “चाय बनाने के लिए भी आलसी “… 
रसोई कभी आयी नहीं थी उसको।  अब आने की कोशिश पूरी थी।  डर और खुद पे भरोसे की कमी…कोशिश जितनी ही गहरी थी । 
 
पिछले कुछ सालों में कोशिश कुछ कम पड़ रही थी, शायद ; चाहे कितना भी जान लगा दे वो।  हर बार उसके कोशिश की मुलाकात किसी के सलाह से, मज़ाक से , नुस्खों से या फिर तानों से होती।
 
ग़ुरूर क्या ? यहाँ  हर सुबह अपने स्वाभिमान को टटोलती।  
 
“तुम कोशिश करोगी, तो कर पाओगी।  ये इतनी बड़ी चीज़ तो है नहीं। चलो आज की सब्ज़ी तुम अकेले बना लो। देखते हैं। ”  
 
हर दो मिनट में उसके एक चमच मसाले के बाद माँ  स्वाद चखती।  “अरे और ज़रा सा डलेगा शायद … अरे ये तोह तेज़ डल गया… ज़रा सा ध्यान देना ज़रूरी है। …”  हमेशा वो उससे भी सतर्क रहते, कि कहीं गलती से भी उससे गलती न हो जाये। 
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कहाँ वो यहाँ ज़िन्दगी अपनाने चली थी ! यहाँ तोह उसकी गलती भी उसकी अपनी नहीं हो सकती थी ! 
 
सलाह इतने सलीक़े से आते, की कब घाव कर निकल गए, किसीको पता भी नहीं चलता। हर बार वह कहती , “जी माँ , सही बताया आपने।  अगली बार फ़िर  कोशिश करती हूँ, पूरे मन से ।” कई बार तो इतना मुस्कुरा कर कहती कि मानो , किसीने मुसकान  को चेहरे पे  Fevicol से चिपकायी हो।   
 
मन!? मन तो दद्वं  में ऐसे उलझा होता , रोज़ खुद से ये कहता, ” तुम कह क्यों नहीं देती उनसे ? तुम सेह क्यों लेती हो हमेशा ? तुम्हारी कोशिश कुछ कम नहीं थी… बल्कि उनकी कोशिश पूरी है, की तुम्हारी कोशिश को नकार दें !”
 
“कब बोलना सीखेगी अपने लिए !?! बस कह डालो।  कि तुम्हें चुभती हैं ये 108 नुस्ख़े उनके…की तुम्हें भी तकलीफ़ होती है … “
 
रात भर उसकी अच्छाई -बुराई  उसके मन में जंग लड़ लेते।  और शहीद होती तो उसकी नींद, उसका सुकून। काग़ज़ पर लिख कर, Book Shelf  पर चिपकाकर वो सो जाती , ” लेहरों से डरकर नौका पार नहीं होती।  कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।  “
 
महीने बीत जाते  और उसकी कोशिश हमेशा कम पड़ जाती।  कभी चाय में चीनी कम  तो कभी सब्ज़ी में नमक ज़्यादा पड़ जाती। … 
 
फ़िर एक दिन , धैर्य हार मान लेता है।  कोशिश करने सी ही इनकार कर देता है। 
 
कमरे में चेहरा पोछते हुए इक खाली पन्ने पर वह लिखती , ” अति का भला न बोलना , अति की भली न चुप।  अति का भला न बरसना, अति  की भली न धूप ” इस काग़ज़ को पुराने वाले के ऊपर चिपकाती। महीनों तक वो उस काग़ज़  को पढ़ती… अपने रूह में उन शब्दों की सेना बनती। और कमरे से बहार निकलते ही उस सेना को भूला देती। 
 
रसोई से प्रेशर कुकर की सीटी और माँ की पुकार ,अब खाना लगाने की सलाह दे रहे थे।  नमक की डिबिया को वह मेज़ पर रख लेती- आज उसे मालूम था की सब्ज़ी में नमक कम था। आज तक न नमक उसका, न फ़ैसले उसके, न ही गलती ही उसकी हो पायी थी।  सब कुछ तो बस सलाह था !
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खाना खाते खाते दो चार सलाह और मिल गए थे , “Recipe Book में जैसा लिखा हो , बस उतना भी कर लेने से ठीक बन जाता है। कोई बात नहीं , अगली बार कर लेना। …” 
 
इस बार “कोई बात” ज़रूर थी।  इस बार सालों से सुना हुआ “अगली बार ” , कानों से गुज़र कर दिल पे नहीं , स्वाभिमान पे लगा था । 
 
Recipe book  की और झाँकती , उसकी मुस्कान अब Fevicol  वाली न थी। अपने कटोरे की सब्ज़ी में नमक डाल कर उसने नमक की डिबिया उनके ओर  बढ़ाई ….. आवाज़ में उसकी, गरीमा  लौट आयी थी…  
 
“माँ जी।  में नहीं कह रही हूँ। आपके Recipe Book में लिखा है , ‘नमक स्वाद अनुसार’ ! “
 
किसीके गले से निवाला उतरा नहीं और वो सुकून से अपना खाना ख़तम कर, थाली रसोई में रख, हाथ धोकर अपने कमरे में चली गयी। 
अपने डायरी के पहले पन्ने पर, भगवान् के नाम के नीचे, बड़े बड़े अक्षरों से लिखा , “नमक स्वाद अनुसार ” … 
 
और हँस पड़ी। 
PS: Excerpts of the two poems cited above are from Harivansh Rai Bachchan’s ‘Koshish karne waalon ki kabhi haar nai Hoti’  and from Kabir Das ke Dohe, respectively.
The characters bear no resemblance to the author, yet they bear all resemblance to all the women out there, who juggle with their aspirations in life and struggle with their rites of passage in marriage.
And one fine day, become the Namak Halal/ Haram (depending on whom they bear allegiance to ) and say it aloud, “Namak Swaad Anusaar”
Peace.
🙂
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22 responses to “~नमक स्वाद अनुसार~

  1. Thanku Mam for this post . It made me feel normal about my feelings . I had been conditioned in my growing years to endure whatever treatment is meted out to me at the in laws place . We can’t even express our displeasure. That’s the norm .It costs a lot to the sensitive souls .And , I had been killing a lot of my time and energy thinking and crying over it .It hurts more when I am in the UPSC preparation mode. Cried while reading it but at the same time felt blissful . Thanks again .

  2. Every woman could co relate with your write up! But now it’s the time to say Namak Swad Anusar!

  3. Nice post as always! Had to use Google translate in some parts…..LOL, what a mistake as some things clearly get lost in translation! Take a look:

    किसीके गले से निवाला उतरा नहीं और वो सुकून से अपना खाना ख़तम कर, थाली रसोई में रख, हाथ धोकर अपने कमरे में चली गयी।
    Acc. to Google Translate:
    The donkey did not descend from someone’s neck and he ended his meal with ease, kept the plate in the kitchen, washed his hands and went to his room.

    Hit over the head with this gada se gadha moment! 😀

  4. Haha… Namak swada anusaar…. Loved it mam 🙂

  5. Great piece..touches the heart..tugs at it slowly but surely.

  6. Good initiative to change our society thinking…Nice message…n comedy also…namak SWAD anusar

  7. This is too too gud … Cudnt resist it reading even at 5 am …am sure each of us out there can relate to this.😘😘

  8. Can be easily related to any other married Indian women….too good 😊👌

  9. Wow wow wow 😍 u wrote it so beautifully and penned it amazingly 👌🏻👌🏻👌🏻👍🏻👍🏻👍🏻

How much does it cost your Comment? Your While. My Smile.

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