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खाली घर में नींद क्यों नहीं आती है ?


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घर भर में इतना शोर है।
कभी किचन से कुकर की सीटी ,
तो कभी डैडी के न्यूज़ का ज़ोर है।

कभी बेवक़्त के डिलीवरी बॉय की घंटी ,
तो कभी मम्मी से मिलने बगल वाली आंटी।
कभी मेरी शैतान छोटी के नख़रे –
नींद को मेरी जो बिखरे।

इक मोटी सी नॉवेल हाथ में लिए,
आँख मेरी जो मूंदती हूँ ,
इन ड्रामेबाज़ों के रहते ,
फ़ालतू ही दोपहर की नींद ढूंढ़ती हूँ।

आँखें बंद हो जाती , पर साँस की फ़रमाइश नहीं।
“साथ में ये नई वाली ख़ाना खज़ाने की एपिसोड देखेंगे।
देखते देखते संडे की दोपहर , ससुरजी के दो मेहमान आ टपकेंगे।

थक हार के बीच रात, आँखें नींद से मजबूर  हैं।
पर हस्बैंड ये कम्बख़त करवट लेता भरपूर है।
आधी रात तक मोबाइल पर लगा रहता है।
उसके रौशनी से परेशान, मेरा रूह जगा रहता है।

हे भगवान ! बस देदो मुझे एक सर्दी की रात !
यही रजाई , यही तकिये।
बस कोई न हो साथ !

निशब्द हो घर और
में सुकून से सोऊँ।
खोई नींद के लिए,
रोज़ रोज़ न रोऊँ !

ठंड की कई रात मिली,
या मिले कहो कई साल।
मगर मिला नहीं बस नींद मेरा ,
अब भी हूँ बेहाल !

मेरी करवट कुछ ज़्यादा ही शोर मचाती है।
घडी की सुइयों की दौड़ सुनाई देती है।
बाथरूम का खुला नल , रात भर ढोल बजाता है…
छिपकलियों की गुफ़्तगू मेरी नींद को सताता है।

बीच रात तक फ़ोन पर , वीडियो कॉल अब करती हूँ।
बिन बातें किये कहीं सो न जाऊँ , इस से काफ़ी डरती  हूँ।

कोई चिंता तो नहीं है। कोई ग़म भी नहीं।
कोई शोर भी नहीं है। कोई शोर मचाने वाले भी नहीं।
पर जाने क्यों भगवान् ,
नींद भी नहीं ??!

निशब्द अँधेरा कमरा , प्यारी सी रजाई ,
बढ़िया सा बिस्तर मेरा , पर जाने क्यों नींद न आयी !

महीने में कुछ दिन अब शोर वाले आकर चले जाते हैं।
करवटें , टीवी , ख़र्राटे , कुकर की सीटी साथ लाते हैं …

फ़ालतू के हँसी की ठहाकों से परेशान ,
मैं तकिये के नीचे सिर दबोचती हूँ ,
फ़िर अगले सुबह हीं  काफ़ी देर से जगती  …
बच्चों जैसी नींद मैं सोती हूँ।

शोर वाले जब चले जाते हैं ,
निशब्द अँधेरा कमरा , प्यारी सी रजाई छोड़ जाते हैं।
पर नींद भी उनके साथ ही चली जाती है …
कोई मुझे ये समझाए , ” खाली घर में नींद क्यों नहीं आती है ?”

 

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बात क्या है !


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बात ऐसी है नहीं , जैसा तुम समझती हो।

छोटी छोटी बातों का बतंगड़ क्यों बनती हो ?
हर एक बात को पकड़ कर उलझती हो , उलझाती हो।

अब बस !  मैं समझ ही नहीं पाता  हूँ , जाने तुम क्या चाहती हो !

हाँ। … सही कहा।
बात बस अब ये है कि हर बात को समझाना पड़ता है।
छोटी बातें मायने ही नहीं रखती अब।
कुछ बड़ा हो तो नज़र आता है।

उलझना उलझाना …इक इक बात को पकड़ कर
उस से इक शायरी चुराना ,
पहले वहीँ तो भाता था !

पर बस ये समझ नहीं पाती हूँ …
अब क्यों तुम समझ नहीं पाते वह बातें ,
जो तब समझ ख़ूब थे आते ?

बात बस अब ये रही, कि
अनकही बातें समझने से दूर ,
आज कही-सुनी समझने समझाने की नौबत आ गयी…

चलो जाने दो !
फ़िर तुम मुझसे पूछोगे ,

“बताओ तो ! बात क्या है ?”