बात क्या है !


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बात ऐसी है नहीं , जैसा तुम समझती हो।

छोटी छोटी बातों का बतंगड़ क्यों बनती हो ?
हर एक बात को पकड़ कर उलझती हो , उलझाती हो।

अब बस !  मैं समझ ही नहीं पाता  हूँ , जाने तुम क्या चाहती हो !

हाँ। … सही कहा।
बात बस अब ये है कि हर बात को समझाना पड़ता है।
छोटी बातें मायने ही नहीं रखती अब।
कुछ बड़ा हो तो नज़र आता है।

उलझना उलझाना …इक इक बात को पकड़ कर
उस से इक शायरी चुराना ,
पहले वहीँ तो भाता था !

पर बस ये समझ नहीं पाती हूँ …
अब क्यों तुम समझ नहीं पाते वह बातें ,
जो तब समझ ख़ूब थे आते ?

बात बस अब ये रही, कि
अनकही बातें समझने से दूर ,
आज कही-सुनी समझने समझाने की नौबत आ गयी…

चलो जाने दो !
फ़िर तुम मुझसे पूछोगे ,

“बताओ तो ! बात क्या है ?”

 

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