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~ माँ तुम पर बड़ा गुस्सा आता है ~


 
माँ तुम पर बड़ा गुस्सा आता है।
तुमको पनीर , खीर, मिठाई क्यों कुछ नहीं भाता है। 
 
इतनी दूर चलकर  मैं थक जाती हूँ ,
फ़िर भी तुममें , ज़रा सी थकान  नहीं देख पाती हूँ। 
तुम ही बताओ कैसे ? 
तुमपे बड़ा गुस्सा आता है !
 
हर बार ये पूछती रहती हो ,
” क्या पहनूँ ? पड़ोसी  ये पूछे तो क्या कहूँ ?
तुम्हें क्या कहना है , क्या करना है.. 
तुम खुद क्यों नहीं सोच पाती हो ?
 
तुमने तो PhD की है,
फिर ख़ुद क्यों न निर्णय लेती हो !
हाय तुमपे बड़ा ग़ुस्सा आता है !
 
त्यौहार पर चुन चुनकर अपने लिए साड़ियाँ लाती हो। 
फ़िर कहती हो पसंद नहीं और हमें थमा जाती हो। 
माँ तुमपे बड़ा गुस्सा आता है !
 
अपनी डायबिटीज की रिपोर्ट छिपाकर ,
घर पे गुलाबजामुन बनती हो ,
कह तोह रही हूँ, हमें मिठाई पसंद नहीं ,
फ़िर भी हमें ख़िलाती हो। 
तुमपे बड़ा गुस्सा आता है !
 
जितना हमारा करना था , तुम कर चुकी। 
अब हमारे बच्चों का हमें क्यों नहीं करने देती ?!
बालों में डाई लगाकर , फ़िरसे क्यों मम्मी बन जाती हो ?!
माँ तुमपे बड़ा गुस्सा आता है! 
 
मुझे अपने बग़ल में सुलाती हो। 
रोते पोते को गोदी में झुलाती हो। 
“बुढ़ापे में नींद कम आती है”,  ये कहती हो। 
 कैसे यक़ीन करूँ तुम्हारा ? कितनी झूठी हो !
 
मुझे नए कपड़ों का शौक़ है , तो तुम्हें सीलने का। 
मुझे लिखने का शौक़ है,  तुम्हें कवितायेँ सुनने का। 
जब देखो हमारे पीछे लग जाती हो। 
ऐसा कौनसा इनसान होगा जिसकी अपनी आकांक्षाएँ न होती हो ?
माँ तुमपे बड़ा ग़ुस्सा आता है !
 
जहाँ हम चल न पाएँ , वहाँ तुम दौड़ जाती हो। 
क्या साबित करना चाहती हो ?
कितना दिखावा करती हो !
माँ तुम झूठी हो !
 
हमारे मींटिंग्स होने पर ,
ख़ुद टैक्सी से घर आ जाती हो। 
” इंडिपेंडेंट ” होने में मज़ा ही अलग है , कहती हो।
कितना शर्मिंदा जो करती हो। 
माँ तुमपर बड़ा ग़ुस्सा  आता है !
 
ज़िन्दगी अपनी , दूसरों के लिए जीती हो। 
रोती हो उस बात पर जो हमपर बीती हो। 
क्या तुम त्याग की देवी हो  ?
ना माँ , तुम झूठी हो !
 
माँ तुमपर बड़ा गुस्सा आता है ,
के आख़िर तुमको ग़ुस्सा क्यों नहीं आता है ?!
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