Category Archives: PS’ Poetic Pen

~ हिचकियाँ ~


बड़े दिनों बाद हिचकियाँ आयी हैं आज,

ऐसा लगा मानो किसी ने ,
“Miss You too” कहा हो। ..
 
सड़क पे गोल -गप्पे खाते हुए,
बारिश की पानी पर छप -छपाते हुए ,
इक पुरानी अधूरी कविता को पूरा करते हुए,
गुरुद्वारे में सूजी का हलवा खाते हुए ।
 
हिचकियों ने आज मुझे कुछ याद दिलाया।
या फ़िर , “तुम आज भी भूली नहीं !”
इसका एहसास कराया।
 
पड़ोस के बच्चों से बच्चा बनकर खेलते हुए ,
बाज़ार में भिंडी का मोल- भाव करते हुए
सुबह नींद से जगकर मुँह धोते हुए,
खाली शीशे में कहीं तुम्हें ढूँढ़ते हुए…
 
पिक्चर देखते – देखते बेवजह हँसते हुए
ऑफिस के लिए क्या पहनूँ ये चुनते हुए ,
 
आरती की थाली में अगरबत्ती जलाते हुए
रात को तकिये पर दो बूँद टपकाते हुए….
 
बताओ !
मेरी हिचकियों से यहाँ ,
तुम्हे वहाँ हिचकियाँ तो नहीं आयी थी ?
 
आज वक़्त के सूनेपन को,
मेरी हिचकियों ने भरा
शायद तुमने मुझे,
कहीं याद किया हो ज़रा !
कमबख़्त ये हिचकियाँ भी बड़ी ज़िद्दी होती हैं !
ये हिचकियाँ मानती नहीं कोई दूरियाँ।
ये हिचकियाँ समझती नहीं मजबूरियाँ !
 
इन हिचकियों से थक कर
शाम को घर लौटकर,
तुम उधर अपने घर की घंटी बजाते हो,
मैं इधर अपने घर का ताला खोलती हूँ। …
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Mussoorie Melancholy


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A melancholy tune ,
Made me peep through the window.
Perched atop the Rhododendron,
Was a Lark blue and yellow

She seemed to lament
that her nest was robbed by the tree.
While the tree lamented
its own misery…

Branches barren, leaves gone.
For reasons only man has known.

It stared at the hillocks nearby,
All his friends were lumbered,
As he watched them die.

So, it told the lark to
celebrate the survivors fate..
Sing through the clouds
for his departed mate.

And together they looked on.
The hills bleak & forlorn,
Sang the melancholy tune.
While, Man afar lumbered his fortune.

माफ़ी ~ Forgiveness


सरे आम जो बदनाम करते हो,
फ़िर माफ़ी क्यों छिपकर मांगते हो?
जाने ऐसी कौनसी ,
किससे छिपाने वाली बात हो गयी ?

इतनी बेदर्दी से जो दर्द दिया,
मेरी नफ़रत भी तुमसे खफ़ा हो गयी .

अब रूठी तो नहीं हूँ, ये पूछते हो.
क्यों तुमसे रूठूँ, ये सोचते हो.
हाँ. जब अनजाने थे, तो बात अलग थी.
अब तो जान बूझ कर बेगाने हुए.

तुमसे भला अब क्या शिक़वा  गिला,
वो तो तब था, जब तुम अपने थे.

वो स्नेह पर जो कीचड की छीटें पड़ीं,
मेरी आँखों से टपक कर सारी धुल गयीं .

बेदाग़ है अब जो दामन तुम्हारा,
तुम मेरी परवाह न करो.
मेरी माफ़ी बेहिसाब है.

ख़ुले आम ही नफ़रत कर लेते,
क्यों छिप कर ये वार किया?
वैसे भी ! मेरी सज़ा से कब तुम डरे हो !
जो अपनी नफ़रत जताने में इतना वक़्त लिया !

जाने ऐसी कौनसी
किससे छिपाने वाली बात हो गयी.
इतनी बेदर्दी से जो दर्द दिया,
मेरी नफ़रत भी तुमसे खफ़ा हो गयी…

 

कुछ ज़्यादा ही !


कुछ ज़्यादा ही दे दिया.
बिन मांगे, बिन कहे
कुछ ज़्यादा ही जुड़ लिया

अब फिर गुस्सा सा आता है,
कि तुमको इसकी कद्र नहीं,
क्या पता शायद
इसकी ख़बर ही नहीँ.

बिन माँगे न सही,
ज़रा पुछा हुआ सा,
मेरे प्यार का हिस्सा तो मिले,
फिर कैसे न रखूँ मैं,
ये ज़रा से शिकवे गिले !

जो तुम्हारा था सब,
उसे भी अपना कर बैठ गयी.
अब तुम जो माँग रहे हो वापिस ,
क्या कहूँ! उसे कहाँ कहाँ समेट गयी !

और जो मेरा था,
वो भी तो दे दिया.
बिन मांगे तुमने,
मेरा सब कुछ तोह ले लिया!

अब क्या लिया मुझसे,
खबर नहीं जो तुम्हे इसकी,
वापिस क्या माँगू तुमसे उन चीज़ों को,
मोल भाव ही नहीं जिसकी.

बेफ़िक्र, बेज़िक्र- अब तुम जो चल दिए.
गुस्सा अब खुद पर आता है.
मैंने क्यों तुमसे वह वादे निभाए,
जो शायद तुमने कभी नहीं किये.
कमीज़ के बटन की तरह
तुम टूट कर जो आज़ाद हुए,
न जाने, कुछ धागे मुझपर
अब भी अड़कर रह गए !

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PS: Trying my hand on Hindi again. An ode to all those who silently give and silently expect the love in return as well. After all it is called ‘Being Human’ whose love is often Unrequited Love 🙂

De-Feet


Peach nail paint, sometimes beige too,
the White of her feet
and the same peep-toe shoe

Somethings never change
Yet somethings do…

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A decade back perhaps
the day I first saw her
Breeze blowing away her silk scarf,
and her long skirt floating forever.

There was something about her smile
and those eyes which defied
a black and white frame,
the endless banter- I hardly listened,
It got me insane! Insane!!

Oh Boy! she made me coy!
As her voice into my ears drift,
my gaze stuck to her feet,
my eyes, I could hardly lift!

Those feet peeped through the patialas
They were careful of the grass they tread.
They wouldn’t kill those ants
or trample the flowering reed.

Those feet walked miles,
miles into my world of imagination.
Those feet walked miles,
miles away from my contemplation.

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Years later, I would hear the voice again.
Only, it’s no more a banter.
There’s still something about those eyes,
that makes one wonder…

“Do years get into a man,
or a man gets into the years gone by…?”
They fill each other so perfectly,
without asking ever a why!

Those feet peeped through
the pleats of her saree,
the peach nail paint
on the feet of the fairy.

And the brown peep-toe shoe
Somethings never change,
Yet somethings do.

A dragonfly struggled, stuck in the mud
those feet shuffled, careful not to hurt.

The mad crowd jostled by,
oblivious of the ground.
Those feet silently guarded
the little winged thing they’d found.

I bent down to pick it up
and saw her smile again.
She would never know,
those little things on her feet
have caused my heart so much pain…

Although knowing it couldn’t fly ever,
I set it free on a shrub.
Like 10 years back one day,
I had set free my love.

I asked, “Happy Now?”
those lips twinkled,
those eyes smiled.

The peach nail paint
and those toe rings few
the white of her feet
and the peep toe shoe

I wish I could ask,
“Why somethings never change,
Yet somethings do??”

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PS: In India, the Toe-rings are considered as a symbol of marriage. Most of the single women do not wear those.