Category Archives: PS’ Poetic Pen

Rain kissed


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Rain kissed Clouds,
Too heavy to stay back in the sky,
Too stubborn to give away and fall.

Hanging like uncertainty over fate,
They seek the opportune moment & wait.

They would fall soon,
With their pride crushing,
kissing the ground

Washing away all that was,
All moments from the past.
Some that were lost;
And some that were found.

And then you think,
“What’s the pride worth?
If time swallows this paper,
In its stoic ink…
All in an eternal blink!

Yet! Clouds like fate,
Seek the opportune moment
And wait…

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~ चाहत ~


तुम्हें चाहना तो मना था,
और पाना  जैसे ग़ुनाह ।  
फ़िर,

न चाह  कर भी  चाह  लिया ,
न जाने ऐसा क्यों हुआ !
 
ज़िन्दगी इक ओर खींचती ,
और तुम खींचते इक ओर ,
बावली हो पड़ती मैं,
कि बह जाऊँ किस छोर। 
 
तुमसे ऊपर ज़िन्दगी को चुना ,
लगा आसान है। 
कहाँ मालूम मुझे,
मेरी बेपरवाह रूह बेईमान है !
 
न चाहकर भी तुम्हें चाहती ,
फ़िर ख़ुद को इसकी सज़ा सुनाती। 
उस  सज़ा के चार पल में भी,
तुम्हारे ज़िक्र का  दो लम्हां  चुरा लेती। 
 
मैं तुमसे प्यार न करूँ,
इसलिए खुद से लड़ लेती,
तुम मुझसे चाहत न रखो 
इसलिए  तुमसे भी झगड़ लेती … 
 
अपने आप से इस जंग में,
थक गयी, हार गयी मैं !
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तुमसे परे कभी कहीं-कहीं …
में अपनी  ख़ुशी जब खोज लेती ,
“तुम माईने ही नहीं रखते,
ये खुद को साबित कर लेती”
 
माईने अगर तुम रखते नहीं ,
तो में किससे क्या साबित कर रही हूँ !?!
मेरे ज़हन में तुम्हारे ख़याल को मारती,
मैं क़तरा क़तरा मर रही हूँ। 
 
न जाने तुम्हें भूलने की चाहत में ,
में अपनी राहत खो बैठी,
सौ नुक़्स  निकाल लिए तुममें,
सौ गलतियाँ भी ढूँढ बैठी….
 
फ़िर  पता नहीं क्यूँ… 
आख़िर ,
उन गलतियों पर भी मुझे प्यार आया ! 
 

~ हिचकियाँ ~


बड़े दिनों बाद हिचकियाँ आयी हैं आज,

ऐसा लगा मानो किसी ने ,
“Miss You too” कहा हो। ..
 
सड़क पे गोल -गप्पे खाते हुए,
बारिश की पानी पर छप -छपाते हुए ,
इक पुरानी अधूरी कविता को पूरा करते हुए,
गुरुद्वारे में सूजी का हलवा खाते हुए ।
 
हिचकियों ने आज मुझे कुछ याद दिलाया।
या फ़िर , “तुम आज भी भूली नहीं !”
इसका एहसास कराया।
 
पड़ोस के बच्चों से बच्चा बनकर खेलते हुए ,
बाज़ार में भिंडी का मोल- भाव करते हुए
सुबह नींद से जगकर मुँह धोते हुए,
खाली शीशे में कहीं तुम्हें ढूँढ़ते हुए…
 
पिक्चर देखते – देखते बेवजह हँसते हुए
ऑफिस के लिए क्या पहनूँ ये चुनते हुए ,
 
आरती की थाली में अगरबत्ती जलाते हुए
रात को तकिये पर दो बूँद टपकाते हुए….
 
बताओ !
मेरी हिचकियों से यहाँ ,
तुम्हे वहाँ हिचकियाँ तो नहीं आयी थी ?
 
आज वक़्त के सूनेपन को,
मेरी हिचकियों ने भरा
शायद तुमने मुझे,
कहीं याद किया हो ज़रा !
कमबख़्त ये हिचकियाँ भी बड़ी ज़िद्दी होती हैं !
ये हिचकियाँ मानती नहीं कोई दूरियाँ।
ये हिचकियाँ समझती नहीं मजबूरियाँ !
 
इन हिचकियों से थक कर
शाम को घर लौटकर,
तुम उधर अपने घर की घंटी बजाते हो,
मैं इधर अपने घर का ताला खोलती हूँ। …
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Mussoorie Melancholy


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A melancholy tune ,
Made me peep through the window.
Perched atop the Rhododendron,
Was a Lark blue and yellow

She seemed to lament
that her nest was robbed by the tree.
While the tree lamented
its own misery…

Branches barren, leaves gone.
For reasons only man has known.

It stared at the hillocks nearby,
All his friends were lumbered,
As he watched them die.

So, it told the lark to
celebrate the survivors fate..
Sing through the clouds
for his departed mate.

And together they looked on.
The hills bleak & forlorn,
Sang the melancholy tune.
While, Man afar lumbered his fortune.

माफ़ी ~ Forgiveness


सरे आम जो बदनाम करते हो,
फ़िर माफ़ी क्यों छिपकर मांगते हो?
जाने ऐसी कौनसी ,
किससे छिपाने वाली बात हो गयी ?

इतनी बेदर्दी से जो दर्द दिया,
मेरी नफ़रत भी तुमसे खफ़ा हो गयी .

अब रूठी तो नहीं हूँ, ये पूछते हो.
क्यों तुमसे रूठूँ, ये सोचते हो.
हाँ. जब अनजाने थे, तो बात अलग थी.
अब तो जान बूझ कर बेगाने हुए.

तुमसे भला अब क्या शिक़वा  गिला,
वो तो तब था, जब तुम अपने थे.

वो स्नेह पर जो कीचड की छीटें पड़ीं,
मेरी आँखों से टपक कर सारी धुल गयीं .

बेदाग़ है अब जो दामन तुम्हारा,
तुम मेरी परवाह न करो.
मेरी माफ़ी बेहिसाब है.

ख़ुले आम ही नफ़रत कर लेते,
क्यों छिप कर ये वार किया?
वैसे भी ! मेरी सज़ा से कब तुम डरे हो !
जो अपनी नफ़रत जताने में इतना वक़्त लिया !

जाने ऐसी कौनसी
किससे छिपाने वाली बात हो गयी.
इतनी बेदर्दी से जो दर्द दिया,
मेरी नफ़रत भी तुमसे खफ़ा हो गयी…