UnOfficially Her – #nofilters

#1 Why Write? Why not Write?


People often flood me with questions and requests regarding “strategy” and “tips” to ‘Crack UPSC ‘ , to become IAS.  And with all due respect, I rightly refrain. Not because it’s some valuable trade secret that I’m zealously guarding, but because it is not one worth emulating for sure. UPSC was an experiment I did on myself, patiently testing my own strengths and shortcomings, one after the other. I have hardly been in the ‘UPSC Mode’, a dedicated 24 X 7 student, revising and re re  revising. Never giving up life nor its many celebrations, trials and tribulations on the go. Hence, my experiments with myself will hardly be of any help to anyone , rather will mislead and blur you with illusions about what to do/ not to do.

I am one, who dreads an “Instruction Manual” of any kind.

Nevertheless, if one can take away something valuable from it- it is being a Reckless Optimist, a Patient Believer who improved an iota each day and didn’t worry about how much time it took, also most importantly loving the journey with its kachcha and pacca roads alike.

Also, I believe ‘tips’ and ‘strategy’ is not the quintessential element for this exam. On the verge of sounding arrogant, I would confess that I hardly tried to befriend any successful candidate, hardly sought any advice. Thus, I strongly believe, it is ONLY YOUR OWN work and self-motivation that helps you get through. No advice/tips however valuable, can become your guiding lights.

Having said so, I would like to share that I used to browse for pictures and stories of LBSNAA, of hardworking Officers on the field, of what they did after they became what they aspired to be. And that surely made me work a notch harder.

Today, as I wake up in the morning, I look forward to the day- of the opportunities that it holds, of the risks that will come my way, of the people that I will meet, of the problems that I might help solving, of the little change that i shall bring in myself and in my surroundings. And I rejoice with gratitude- for there’s never been a dull day- either there’s storm or there’s sunshine.

So, I believe my journey now, may be of some value to someone looking for a little nudge to work a notch higher than they are. And thus I shall share small chunks of my life now and then, as I metamorphose into a different individual in an entirely different land, far away from my own family & friends, speaking a language that I picked up just as I turn 30 and evolving into a inconspicuous cog in the Public Service machinery.

My blog has been my constant companion in times that were tough and lonely. I believe most of us have a bit of what is called “Athazagoraphobia”, or the fear of being forgotten by the people. Some people aspire to leave behind extraordinary legacies , other ordinary folks simply try fighting their Athazagoraphobia, putting effort to remain relevant in this fast moving world. I am the latter and so I write, to satisfy myself that I am doing my bit for not being forgotten .

Also a very crucial DISCLAIMER. This is no attempt to showcase how ‘ Efficient, Compassionate, Ethical or Upright’ I am. I go by my work, with all my imperfections just like most of you. And this page shall just be a crude consequence of my fingers hitting the keyboard carelessly, mostly at midnight. All thoughts… unabridged and raw from the days that left some mark on me. There shall be no “Precious Takeaways” only plain experience sharing with #nofilters .

Yes-  No Instruction Manual. No Bottom Lines. No Filters.


Plant a Tree

If you want to become one with the
earth, water, sun and air;
Plant a tree somewhere.

If you want to live beyond your years;
Plant a tree.

If you want to witness empires come and go,
to become a page of history;
Plant a Tree.

If you want to become a story teller, an artist,
a saint or a sculptor;
Plant a Tree.

If you want to become someone’s home,
someone’s shade, someone’s shoulder;
Plant a Tree.

If you want to become a forever learner,
a patient giver, an observant grower;
Plant a Tree.

If you want to become something
beyond you can ever be;
Plant a Tree.

Yes, if you want to stay after you go;
Then Go!
Go Plant a Tree!


ज़रा इश्क़ सीखा दो !

एक बात पूछें तुमसे ,

ज़रा दिल पर हाथ रख कर केहना। 
जो इश्क़ हमसे सीखा था,
अब वो किससे करते हो ?
जो सीखा था तुमसे ,
वो किसी और से न कभी कर पाए। 
तुमको भूलाने की कोशिश की ,
और बेवजह पछताए। 
हमारी लड़ाई में 
हम दोनों ही हार जाते हैं। 
तैश तुम करते हो ,
और तरस हम जाते हैं … 
काफी वक़्त जो हो गया ,
वक़्त में बहुत कुछ सा खो गया …
तुम अब याद आते नहीं,
दुनिया से लड़, तुमसे मिल जाने की चाहतें नहीं। 
फ़िर भी तुमसे गुफ़्तगू का मोह है !
कुछ बातें ज़रा सी नयी,
बाकी कुछ पुरानी वही !
सच कहते हो तुम ,
तुमसे अब वो उलफ़त न रही। 
पर तुमसे जुड़ी हर लम्हे से है। 
मुझे अबके तुमसे, कोई प्रीत नहीं। 
पर दस साल पहले के, कुछ पल से है …
दस साल में तुम बदले , में बदली ,
न जाने क्या क्या बदल गया !
अगर ज़रा कुछ ठहर गया ,
तो तुमसे बातें करने का जुनून मेरा। 
जो पूछते हो तो लो सुनो !
तुमसे जो इश्क़ सीखा था,
उसे रोज़ इनसे करने की  ख़्वाहिश करती हूँ ….
मेरी नाकामियां मुझे चुभती  हैं 
और दुनिया हमें देख कहती है ,
‘ इश्क़ करना तो कोई इनसे सीखे !’
अब दुनिया को क्या मालूम ,
इश्क़ सीखने सिखाने की चीज़ होती ,
तो अनगिनत ये आरज़ू ,अधूरी क्यों रहती ! 


~ Stained Glass ~

Aren’t we all a piece of
stained glass pottery?
Trotting through life,
playing through its lottery.

We begin with a white, worthless,
see-through shard.
Inconspicuous, fragile, off guard!

In the quest to add a liitle value to ourselves,
We pick some colours from the world’s shelves.

We become stained glass-
A cathedral’s window
Or a flower vase.

The light changes us sometimes.
At others we change it to
a spectrum sublime.

We exchange a few glances
with the world.
Some stories we tell.
Some remain untold.

Then one day we break nevertheless!
The colours go with us
in mysterious ways…
Fragile we still were, to all the way there.
Worthy or worthless?
Who cares!


PS: Metamorphosis of an old neglected vase once inhabited by a moneyplant.
It took refuge under me and I painted it with every colour of my imagination.

~नमक स्वाद अनुसार~

कभी मम्मी कह दे कि आज  ज़रा और  पढ़ लो, Exam नज़दीक आ रहे हैं।  तो लो ! पढाई वहीँ ठप  हो जाती; बड़ा ठेस पहुँचता स्वाभिमान को। अगले दिन सुबह के  तीन बजे, आँखें मलती हुई , गुनगुनाकर , नींद से लड़कर पढ़ती। Mummy  पानी पीने  के लिए  उठकर देखती और कहती, “इतनी भी क्या पढ़ाई ! पागल हो जाओगी !” फ़िर तो ! नींद गायब और चार घंटों  धुआँधार  पढ़ाई  शुरू !
उसे आदत  नहीं थी  कि कोशिश में उसकी कभी कोई कमी रह जाए। चाहे painting बनाने में हो, लोगों से मीठी बातें करने में या किताबों  में डूब कर अपने कल  का सपना देखने में। आस- पड़ोस  का आदर्श कहलाना, सबकी नज़रों में अपनी गरीमा  बनाये रखने  में… उसे खुद पर काफ़ी ग़ुरूर था।  अच्छाई की इतनी गंदी  आदत लगी थी उसको , की किसीसे न बुरा बोल पाती और न ही सेह पाती।  ख़ैर आदत भी अति ही थी। … 
वक़्त के पहिये पलटते गए,  किताबों  की भीड़ में टहलती -खोती , खोजती – ग़ुम होती। …अपने  राह कुछ चुने,  कुछ  बनाए ।  पर कोशिश हमेशा जारी रहती। 
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बावजूद इसके कोई खुश न था ! कभी बिंदी का आकार छोटा लगता , तो कभी हाथों में कँगन कम दिखते , कभी बहुत बातूनी लगती , तो कभी “चाय बनाने के लिए भी आलसी “… 
रसोई कभी आयी नहीं थी उसको।  अब आने की कोशिश पूरी थी।  डर और खुद पे भरोसे की कमी…कोशिश जितनी ही गहरी थी । 
पिछले कुछ सालों में कोशिश कुछ कम पड़ रही थी, शायद ; चाहे कितना भी जान लगा दे वो।  हर बार उसके कोशिश की मुलाकात किसी के सलाह से, मज़ाक से , नुस्खों से या फिर तानों से होती।
ग़ुरूर क्या ? यहाँ  हर सुबह अपने स्वाभिमान को टटोलती।  
“तुम कोशिश करोगी, तो कर पाओगी।  ये इतनी बड़ी चीज़ तो है नहीं। चलो आज की सब्ज़ी तुम अकेले बना लो। देखते हैं। ”  
हर दो मिनट में उसके एक चमच मसाले के बाद माँ  स्वाद चखती।  “अरे और ज़रा सा डलेगा शायद … अरे ये तोह तेज़ डल गया… ज़रा सा ध्यान देना ज़रूरी है। …”  हमेशा वो उससे भी सतर्क रहते, कि कहीं गलती से भी उससे गलती न हो जाये। 
कहाँ वो यहाँ ज़िन्दगी अपनाने चली थी ! यहाँ तोह उसकी गलती भी उसकी अपनी नहीं हो सकती थी ! 
सलाह इतने सलीक़े से आते, की कब घाव कर निकल गए, किसीको पता भी नहीं चलता। हर बार वह कहती , “जी माँ , सही बताया आपने।  अगली बार फ़िर  कोशिश करती हूँ, पूरे मन से ।” कई बार तो इतना मुस्कुरा कर कहती कि मानो , किसीने मुसकान  को चेहरे पे  Fevicol से चिपकायी हो।   
मन!? मन तो दद्वं  में ऐसे उलझा होता , रोज़ खुद से ये कहता, ” तुम कह क्यों नहीं देती उनसे ? तुम सेह क्यों लेती हो हमेशा ? तुम्हारी कोशिश कुछ कम नहीं थी… बल्कि उनकी कोशिश पूरी है, की तुम्हारी कोशिश को नकार दें !”
“कब बोलना सीखेगी अपने लिए !?! बस कह डालो।  कि तुम्हें चुभती हैं ये 108 नुस्ख़े उनके…की तुम्हें भी तकलीफ़ होती है … “
रात भर उसकी अच्छाई -बुराई  उसके मन में जंग लड़ लेते।  और शहीद होती तो उसकी नींद, उसका सुकून। काग़ज़ पर लिख कर, Book Shelf  पर चिपकाकर वो सो जाती , ” लेहरों से डरकर नौका पार नहीं होती।  कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।  “
महीने बीत जाते  और उसकी कोशिश हमेशा कम पड़ जाती।  कभी चाय में चीनी कम  तो कभी सब्ज़ी में नमक ज़्यादा पड़ जाती। … 
फ़िर एक दिन , धैर्य हार मान लेता है।  कोशिश करने सी ही इनकार कर देता है। 
कमरे में चेहरा पोछते हुए इक खाली पन्ने पर वह लिखती , ” अति का भला न बोलना , अति की भली न चुप।  अति का भला न बरसना, अति  की भली न धूप ” इस काग़ज़ को पुराने वाले के ऊपर चिपकाती। महीनों तक वो उस काग़ज़  को पढ़ती… अपने रूह में उन शब्दों की सेना बनती। और कमरे से बहार निकलते ही उस सेना को भूला देती। 
रसोई से प्रेशर कुकर की सीटी और माँ की पुकार ,अब खाना लगाने की सलाह दे रहे थे।  नमक की डिबिया को वह मेज़ पर रख लेती- आज उसे मालूम था की सब्ज़ी में नमक कम था। आज तक न नमक उसका, न फ़ैसले उसके, न ही गलती ही उसकी हो पायी थी।  सब कुछ तो बस सलाह था !
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खाना खाते खाते दो चार सलाह और मिल गए थे , “Recipe Book में जैसा लिखा हो , बस उतना भी कर लेने से ठीक बन जाता है। कोई बात नहीं , अगली बार कर लेना। …” 
इस बार “कोई बात” ज़रूर थी।  इस बार सालों से सुना हुआ “अगली बार ” , कानों से गुज़र कर दिल पे नहीं , स्वाभिमान पे लगा था । 
Recipe book  की और झाँकती , उसकी मुस्कान अब Fevicol  वाली न थी। अपने कटोरे की सब्ज़ी में नमक डाल कर उसने नमक की डिबिया उनके ओर  बढ़ाई ….. आवाज़ में उसकी, गरीमा  लौट आयी थी…  
“माँ जी।  में नहीं कह रही हूँ। आपके Recipe Book में लिखा है , ‘नमक स्वाद अनुसार’ ! “
किसीके गले से निवाला उतरा नहीं और वो सुकून से अपना खाना ख़तम कर, थाली रसोई में रख, हाथ धोकर अपने कमरे में चली गयी। 
अपने डायरी के पहले पन्ने पर, भगवान् के नाम के नीचे, बड़े बड़े अक्षरों से लिखा , “नमक स्वाद अनुसार ” … 
और हँस पड़ी। 
PS: Excerpts of the two poems cited above are from Sohan lal Dwivedi’s ‘Koshish karne waalon ki kabhi haar nai Hoti’  and from Kabir Das ke Dohe, respectively.
The characters bear no resemblance to the author, yet they bear all resemblance to all the women out there, who juggle with their aspirations in life and struggle with their rites of passage in marriage.
And one fine day, become the Namak Halal/ Haram (depending on whom they bear allegiance to ) and say it aloud, “Namak Swaad Anusaar”