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कुछ ज़्यादा ही !


कुछ ज़्यादा ही दे दिया.
बिन मांगे, बिन कहे
कुछ ज़्यादा ही जुड़ लिया

अब फिर गुस्सा सा आता है,
कि तुमको इसकी कद्र नहीं,
क्या पता शायद
इसकी ख़बर ही नहीँ.

बिन माँगे न सही,
ज़रा पुछा हुआ सा,
मेरे प्यार का हिस्सा तो मिले,
फिर कैसे न रखूँ मैं,
ये ज़रा से शिकवे गिले !

जो तुम्हारा था सब,
उसे भी अपना कर बैठ गयी.
अब तुम जो माँग रहे हो वापिस ,
क्या कहूँ! उसे कहाँ कहाँ समेट गयी !

और जो मेरा था,
वो भी तो दे दिया.
बिन मांगे तुमने,
मेरा सब कुछ तोह ले लिया!

अब क्या लिया मुझसे,
खबर नहीं जो तुम्हे इसकी,
वापिस क्या माँगू तुमसे उन चीज़ों को,
मोल भाव ही नहीं जिसकी.

बेफ़िक्र, बेज़िक्र- अब तुम जो चल दिए.
गुस्सा अब खुद पर आता है.
मैंने क्यों तुमसे वह वादे निभाए,
जो शायद तुमने कभी नहीं किये.
कमीज़ के बटन की तरह
तुम टूट कर जो आज़ाद हुए,
न जाने, कुछ धागे मुझपर
अब भी अड़कर रह गए !

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PS: Trying my hand on Hindi again. An ode to all those who silently give and silently expect the love in return as well. After all it is called ‘Being Human’ whose love is often Unrequited Love 🙂

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