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🌱Crack in the Wall🌱


Grow wherever you’re planted.
An impervious heartless boulder,
Or a placid garden bed.

When you walked the rough,
Your feet must have bled.
Keep walking anyway
Though tears you may shed.

Sometimes as you fiddle,
You may find a crack in the wall.
You rush to break through,
You give it your all.

But often walls are stubborn.
As stubborn as you are.
You can’t give up anyway.
So you brace up for the war.

You slowly break the bricks,
Your roots melt the mortar.
And you make your own
crack in the wall.

You grow at your own pace,
Your roots stumble through your struggle.
Yet you go on with grace.

So may you find your crack in the wall,
Or may you create one.
May you fight and win over,
The rains, wind & the sun.

Sometimes you walk the path you choose.
At others, you walk where the paths led.
And so you grow where you’re planted.

PS: My first Micropen artwork . With a whiny hyper baby, it took me two days to finish it off. The plump woman in the picture, represents the postpartum me😅🤭

~ धैर्य का बाँध ~


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दुनिया पत्थर फेंकती गयी ,
धैर्य बाँध बांधते गया।
समझदारी ने बार बार चेतावनी दी।
हे धैर्य ! मत बटोर ये पत्थर कंकर।
फ़ेंक दे उन्हें उन्ही पे जहाँ से वह आये हैं।

मत समेट अपने अंदर ,
आँसुओं की बाढ़, अभिमान की आँधियाँ
इक दिन वो आपे से बाहर हो जाएँगे।
तेरी सहनशीलता पर प्रलय वो लाएँगे।

दुनिया की फेंकी पत्थर तू बटोरता है जब ,
तुझे शौक है चुप रहने का , सब सहने का –
दुनिया समझती है तब।

तू सोचता है इन पत्थरों को ईंट बनाकर ,
उस दीवार से अपने क्रोध को छिपाएगा।
बोल हे धैर्य ! आख़िर कब तक अपने रूह को रुलाएगा ?

दीवार चाहे जितनी बड़ी बनाले तू ,
दुनिया और कंकर फेंकती जाएगी।
बड़े बड़े पत्थर सह गया है तू ,
पर इक छोटे से कंकर से तेरे बाँध पे
इक बड़ी सी दरार आएगी।

तेरी दृढ़ता तेरा सब्र ,
तेरी मूर्खता कहलाएँगे।
तेरे अंदर दबे तेरे सारे आँसू,
ज्वाला बनकर बह जाएँगे।

उनके फेंके कंकर से,
धैर्य तेरी बाँध जब टूट जाएगी,
तब भी ये ज़ालिम दुनिया,
तुझे ही दोषी बतलाएगी।

तेरी चुप्पी के जो आदी हैं ,
तेरी कराह को भी सह न पाएँगे।
तेरे आत्म सम्मान को तेरा अहंकार बताकर,
तुझीको मुल्ज़िम ठहराएँगे !

अब भी वक़्त है धैर्य।
मत ले अपने धीरज की परीक्षा ,
मत कर सही वक़्त की प्रतीक्षा।
बोल डाल वो शब्द जो तेरे मन में हैं।
दुनिया जो उससे जख़्मी हो जाये, तो होने दे !

मत बना ये बाँध ,
लौटा दे उनके पत्थर कंकर।
तूने जो उनसे खाई है ,
लौटा दे उन्हें उन्ही की ठोकर।

बन जाने दे बाग़ी अपने धीरज को,
आज सेह मत जा सहमकर !
दुनिया को पता तो चले ,
अब धैर्य तेरा भी बाग़ी है !!

 

खाली घर में नींद क्यों नहीं आती है ?


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घर भर में इतना शोर है।
कभी किचन से कुकर की सीटी ,
तो कभी डैडी के न्यूज़ का ज़ोर है।

कभी बेवक़्त के डिलीवरी बॉय की घंटी ,
तो कभी मम्मी से मिलने बगल वाली आंटी।
कभी मेरी शैतान छोटी के नख़रे –
नींद को मेरी जो बिखरे।

इक मोटी सी नॉवेल हाथ में लिए,
आँख मेरी जो मूंदती हूँ ,
इन ड्रामेबाज़ों के रहते ,
फ़ालतू ही दोपहर की नींद ढूंढ़ती हूँ।

आँखें बंद हो जाती , पर साँस की फ़रमाइश नहीं।
“साथ में ये नई वाली ख़ाना खज़ाने की एपिसोड देखेंगे।
देखते देखते संडे की दोपहर , ससुरजी के दो मेहमान आ टपकेंगे।

थक हार के बीच रात, आँखें नींद से मजबूर  हैं।
पर हस्बैंड ये कम्बख़त करवट लेता भरपूर है।
आधी रात तक मोबाइल पर लगा रहता है।
उसके रौशनी से परेशान, मेरा रूह जगा रहता है।

हे भगवान ! बस देदो मुझे एक सर्दी की रात !
यही रजाई , यही तकिये।
बस कोई न हो साथ !

निशब्द हो घर और
में सुकून से सोऊँ।
खोई नींद के लिए,
रोज़ रोज़ न रोऊँ !

ठंड की कई रात मिली,
या मिले कहो कई साल।
मगर मिला नहीं बस नींद मेरा ,
अब भी हूँ बेहाल !

मेरी करवट कुछ ज़्यादा ही शोर मचाती है।
घडी की सुइयों की दौड़ सुनाई देती है।
बाथरूम का खुला नल , रात भर ढोल बजाता है…
छिपकलियों की गुफ़्तगू मेरी नींद को सताता है।

बीच रात तक फ़ोन पर , वीडियो कॉल अब करती हूँ।
बिन बातें किये कहीं सो न जाऊँ , इस से काफ़ी डरती  हूँ।

कोई चिंता तो नहीं है। कोई ग़म भी नहीं।
कोई शोर भी नहीं है। कोई शोर मचाने वाले भी नहीं।
पर जाने क्यों भगवान् ,
नींद भी नहीं ??!

निशब्द अँधेरा कमरा , प्यारी सी रजाई ,
बढ़िया सा बिस्तर मेरा , पर जाने क्यों नींद न आयी !

महीने में कुछ दिन अब शोर वाले आकर चले जाते हैं।
करवटें , टीवी , ख़र्राटे , कुकर की सीटी साथ लाते हैं …

फ़ालतू के हँसी की ठहाकों से परेशान ,
मैं तकिये के नीचे सिर दबोचती हूँ ,
फ़िर अगले सुबह हीं  काफ़ी देर से जगती  …
बच्चों जैसी नींद मैं सोती हूँ।

शोर वाले जब चले जाते हैं ,
निशब्द अँधेरा कमरा , प्यारी सी रजाई छोड़ जाते हैं।
पर नींद भी उनके साथ ही चली जाती है …
कोई मुझे ये समझाए , ” खाली घर में नींद क्यों नहीं आती है ?”

 

माफ़ी ~ Forgiveness


सरे आम जो बदनाम करते हो,
फ़िर माफ़ी क्यों छिपकर मांगते हो?
जाने ऐसी कौनसी ,
किससे छिपाने वाली बात हो गयी ?

इतनी बेदर्दी से जो दर्द दिया,
मेरी नफ़रत भी तुमसे खफ़ा हो गयी .

अब रूठी तो नहीं हूँ, ये पूछते हो.
क्यों तुमसे रूठूँ, ये सोचते हो.
हाँ. जब अनजाने थे, तो बात अलग थी.
अब तो जान बूझ कर बेगाने हुए.

तुमसे भला अब क्या शिक़वा  गिला,
वो तो तब था, जब तुम अपने थे.

वो स्नेह पर जो कीचड की छीटें पड़ीं,
मेरी आँखों से टपक कर सारी धुल गयीं .

बेदाग़ है अब जो दामन तुम्हारा,
तुम मेरी परवाह न करो.
मेरी माफ़ी बेहिसाब है.

ख़ुले आम ही नफ़रत कर लेते,
क्यों छिप कर ये वार किया?
वैसे भी ! मेरी सज़ा से कब तुम डरे हो !
जो अपनी नफ़रत जताने में इतना वक़्त लिया !

जाने ऐसी कौनसी
किससे छिपाने वाली बात हो गयी.
इतनी बेदर्दी से जो दर्द दिया,
मेरी नफ़रत भी तुमसे खफ़ा हो गयी…

 

~Nature~


Nature is a poem minus words,
a thousand chosen couplets,
from the dreams of the Gods.

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Diamond dew, on flowers frail,
silver storms at the ocean’s tail.

Butterflies in flight,
and their shadows on the soil.
Sparrows snuggling,
after a days toil.

A leaf dancing solo
through the summer air,
from the eerie eucalyptus
on the laterite chair.

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Waters, seemingly flowing
aimlessly to the world’s eyes.
Yet reaching their own predetermined goal,
breaking away from their Earthly ties.

beetles and bees busy preparing,
for the blank white winter’s cold.
Grasses growing little twigs above,
but strong roots beneath, deepening their hold.

saplings tender, so full of life,
peeping from nowhere,
from lifeless lands, barren, bare!

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Clouds or cotton balls?
In skies jungle,
the foxes fumble
and the Lion mauls…

The Touch me not, shying away..
like from a lover’s touch
on an unexpected day.

Gulmohur red and gold as a bride,
Silver firs talking to the clouds with pride.
“You may shine silver.
But more Silver I do hide”

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All comes and all but goes,
where each being with harmony grows.
lives and believes and departs one day,
leaving behind withered and gray.
to rot beneath this earthen pot.
in a form that it was not.

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Majestic mountains might seem mini.
Even tiny Ants have duties many.
Big and small.
Nature has them all.

Each to teach a lessons few,
to rediscover life,
one thought one knew!

O Nature!
No poet’s pen can pen down your beauty,
No painter’s brush paint your bounty,
No photographers’ frame can capture your colour.
No philosopher’s thoughts testify your valour.
No princes’ treasure can buy your riches ,
No prophet’s wisdom preach what Nature teaches.

Tips-for-Decorating-Your-Home-for-Spring

O Nature!!
Invisible you are in a drop,
and anonymous the drop in the sea.
Your Majesty! I could never comprehend thee!

No Hymns hummed for this hero.
No Songs sung for this soul,
You cannot relish it in plucked fragments,
you ought to rejoice it in whole.

O Nature!
The mysterious teacher!!

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PS:
I am in love with my hometown’s serenity, its solitude. Sunabeda is the Mountain’s daughter, brought up by soothing sunshine, reprimanded by torrential rains, pacified by winter fogs, … It has a poem scripted on each leaf, flower and cloud. It has magic in its breath that makes each one a poet. And I am no exception!