Tag Archives: Poetry

~ चाहत ~


तुम्हें चाहना तो मना था,
और पाना  जैसे ग़ुनाह ।  
फ़िर,

न चाह  कर भी  चाह  लिया ,
न जाने ऐसा क्यों हुआ !
 
ज़िन्दगी इक ओर खींचती ,
और तुम खींचते इक ओर ,
बावली हो पड़ती मैं,
कि बह जाऊँ किस छोर। 
 
तुमसे ऊपर ज़िन्दगी को चुना ,
लगा आसान है। 
कहाँ मालूम मुझे,
मेरी बेपरवाह रूह बेईमान है !
 
न चाहकर भी तुम्हें चाहती ,
फ़िर ख़ुद को इसकी सज़ा सुनाती। 
उस  सज़ा के चार पल में भी,
तुम्हारे ज़िक्र का  दो लम्हां  चुरा लेती। 
 
मैं तुमसे प्यार न करूँ,
इसलिए खुद से लड़ लेती,
तुम मुझसे चाहत न रखो 
इसलिए  तुमसे भी झगड़ लेती … 
 
अपने आप से इस जंग में,
थक गयी, हार गयी मैं !
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तुमसे परे कभी कहीं-कहीं …
में अपनी  ख़ुशी जब खोज लेती ,
“तुम माईने ही नहीं रखते,
ये खुद को साबित कर लेती”
 
माईने अगर तुम रखते नहीं ,
तो में किससे क्या साबित कर रही हूँ !?!
मेरे ज़हन में तुम्हारे ख़याल को मारती,
मैं क़तरा क़तरा मर रही हूँ। 
 
न जाने तुम्हें भूलने की चाहत में ,
में अपनी राहत खो बैठी,
सौ नुक़्स  निकाल लिए तुममें,
सौ गलतियाँ भी ढूँढ बैठी….
 
फ़िर  पता नहीं क्यूँ… 
आख़िर ,
उन गलतियों पर भी मुझे प्यार आया ! 
 
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~ हिचकियाँ ~


बड़े दिनों बाद हिचकियाँ आयी हैं आज,

ऐसा लगा मानो किसी ने ,
“Miss You too” कहा हो। ..
 
सड़क पे गोल -गप्पे खाते हुए,
बारिश की पानी पर छप -छपाते हुए ,
इक पुरानी अधूरी कविता को पूरा करते हुए,
गुरुद्वारे में सूजी का हलवा खाते हुए ।
 
हिचकियों ने आज मुझे कुछ याद दिलाया।
या फ़िर , “तुम आज भी भूली नहीं !”
इसका एहसास कराया।
 
पड़ोस के बच्चों से बच्चा बनकर खेलते हुए ,
बाज़ार में भिंडी का मोल- भाव करते हुए
सुबह नींद से जगकर मुँह धोते हुए,
खाली शीशे में कहीं तुम्हें ढूँढ़ते हुए…
 
पिक्चर देखते – देखते बेवजह हँसते हुए
ऑफिस के लिए क्या पहनूँ ये चुनते हुए ,
 
आरती की थाली में अगरबत्ती जलाते हुए
रात को तकिये पर दो बूँद टपकाते हुए….
 
बताओ !
मेरी हिचकियों से यहाँ ,
तुम्हे वहाँ हिचकियाँ तो नहीं आयी थी ?
 
आज वक़्त के सूनेपन को,
मेरी हिचकियों ने भरा
शायद तुमने मुझे,
कहीं याद किया हो ज़रा !
कमबख़्त ये हिचकियाँ भी बड़ी ज़िद्दी होती हैं !
ये हिचकियाँ मानती नहीं कोई दूरियाँ।
ये हिचकियाँ समझती नहीं मजबूरियाँ !
 
इन हिचकियों से थक कर
शाम को घर लौटकर,
तुम उधर अपने घर की घंटी बजाते हो,
मैं इधर अपने घर का ताला खोलती हूँ। …
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कुछ ज़्यादा ही !


कुछ ज़्यादा ही दे दिया.
बिन मांगे, बिन कहे
कुछ ज़्यादा ही जुड़ लिया

अब फिर गुस्सा सा आता है,
कि तुमको इसकी कद्र नहीं,
क्या पता शायद
इसकी ख़बर ही नहीँ.

बिन माँगे न सही,
ज़रा पुछा हुआ सा,
मेरे प्यार का हिस्सा तो मिले,
फिर कैसे न रखूँ मैं,
ये ज़रा से शिकवे गिले !

जो तुम्हारा था सब,
उसे भी अपना कर बैठ गयी.
अब तुम जो माँग रहे हो वापिस ,
क्या कहूँ! उसे कहाँ कहाँ समेट गयी !

और जो मेरा था,
वो भी तो दे दिया.
बिन मांगे तुमने,
मेरा सब कुछ तोह ले लिया!

अब क्या लिया मुझसे,
खबर नहीं जो तुम्हे इसकी,
वापिस क्या माँगू तुमसे उन चीज़ों को,
मोल भाव ही नहीं जिसकी.

बेफ़िक्र, बेज़िक्र- अब तुम जो चल दिए.
गुस्सा अब खुद पर आता है.
मैंने क्यों तुमसे वह वादे निभाए,
जो शायद तुमने कभी नहीं किये.
कमीज़ के बटन की तरह
तुम टूट कर जो आज़ाद हुए,
न जाने, कुछ धागे मुझपर
अब भी अड़कर रह गए !

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PS: Trying my hand on Hindi again. An ode to all those who silently give and silently expect the love in return as well. After all it is called ‘Being Human’ whose love is often Unrequited Love 🙂

Why I couldn’t write about You.


the poet

Once you asked the Poet
Why she wrote a million poems,
yet never one about you?
If you were ever anything to her-
a smoke, a fog, or even a drop of dew?

And you made her think,
your worth, your essence, your being.

You were like Breath,
Always in me,
Although I couldn’t ever see.

I was alive,
I was breathing,
yet never feeling,
The breath in me.

I wrote couplets,
I wrote odes,
At each of life’s crossroads.

You were in me,
You were behind me,
There you were,
where I couldn’t see.

Holding me uptight, whenever I fell,
But you were there with me,
You never could tell…

I saw you at the bends,
when the roads turned
Like a shadow of my past,
That often returned.

You followed wherever I walked,
You listened all through,
I remember,you never talked.

At each road I remember,
I wrote a Poem or two.
Until one day I found,
I have never written about you.

That was the day,
When my last breath was left.
That was the night,
when of words I was bereft.

Perhaps I never wrote,
because you never put me at any crossroad.

You followed me, my Breath.
At each road, until death.
Unseen, unacknowledged.
Taken for granted, in blind faith.

Now,
Your absence was your presence,
A Poem-
Unwritten, unacknowledged,
But speaking  My life’s essence…

The breath was gone.
And I was gone too.
I was gone now,
without writing about you…

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