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~ चाहत ~


तुम्हें चाहना तो मना था,
और पाना  जैसे ग़ुनाह ।  
फ़िर,

न चाह  कर भी  चाह  लिया ,
न जाने ऐसा क्यों हुआ !
 
ज़िन्दगी इक ओर खींचती ,
और तुम खींचते इक ओर ,
बावली हो पड़ती मैं,
कि बह जाऊँ किस छोर। 
 
तुमसे ऊपर ज़िन्दगी को चुना ,
लगा आसान है। 
कहाँ मालूम मुझे,
मेरी बेपरवाह रूह बेईमान है !
 
न चाहकर भी तुम्हें चाहती ,
फ़िर ख़ुद को इसकी सज़ा सुनाती। 
उस  सज़ा के चार पल में भी,
तुम्हारे ज़िक्र का  दो लम्हां  चुरा लेती। 
 
मैं तुमसे प्यार न करूँ,
इसलिए खुद से लड़ लेती,
तुम मुझसे चाहत न रखो 
इसलिए  तुमसे भी झगड़ लेती … 
 
अपने आप से इस जंग में,
थक गयी, हार गयी मैं !
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तुमसे परे कभी कहीं-कहीं …
में अपनी  ख़ुशी जब खोज लेती ,
“तुम माईने ही नहीं रखते,
ये खुद को साबित कर लेती”
 
माईने अगर तुम रखते नहीं ,
तो में किससे क्या साबित कर रही हूँ !?!
मेरे ज़हन में तुम्हारे ख़याल को मारती,
मैं क़तरा क़तरा मर रही हूँ। 
 
न जाने तुम्हें भूलने की चाहत में ,
में अपनी राहत खो बैठी,
सौ नुक़्स  निकाल लिए तुममें,
सौ गलतियाँ भी ढूँढ बैठी….
 
फ़िर  पता नहीं क्यूँ… 
आख़िर ,
उन गलतियों पर भी मुझे प्यार आया !